May 28, 2024

नई दिल्ली, कावेरी जल विवाद पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक को आदेश दिया कि वह अपने बिलिगुंडलू डैम से तमिलनाडु के लिए 177.25 टीएमसी (थाउजेंट मिलियन क्यूबिक) फीट पानी छोड़े। 2007 में कावेरी ट्रिब्यूनल के अवॉर्ड में 192 टीएमसी फीट पानी छोड़ने का ऑर्डर दिया गया था। कोर्ट ने इसमें 14.75 टीएमसी फीट कटौती कर दी। यह विवाद तमिलनाडु-कर्नाटक और केरल के बीच था। तीनों राज्यों ने ट्रिब्यूनल के अवॉर्ड को फरवरी 2007 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत ने पिछले साल 20 सितंबर को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। कर्नाटक और तमिलनाडु एक-दूसरे को कम पानी देना चाहते थे, जिससे अपनी जरूरतें पूरी कर सकें। 120 साल पुराने कावेरी जल विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तमिलनाडु को दिए जाने वाले पानी की मात्रा घटा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे घटाकर 177.27 क्यूसेक कर दिया है। इस फैसले के बाद अब कर्नाटक को मिलने वाली पानी की मात्रा बढ़ जाएगी और उसे अतिरिक्त 14 क्यूसेक पानी मिलेगा। इसके अलावा केरल और पुडुचेरी को मिलने वाले पानी की मात्रा तथावत रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पानी का यह बंटवारा कर्नाटक अपने बिलिगुंडलु डैम से तमिलनाडु के लिए 177.25 क्यूसेक पानी छोड़ेगा। कर्नाटक को अतिरिक्त 14.75 क्यूसेक पानी मिलेगा। कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक को अतिरिक्त पानी देने का फैसला बेंगलुरु में रहने वाले लोगों की जरूरतों को देखते हुए लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के चलते राज्यों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
बेंगलुरु में सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता कर दी गई है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। कावेरी विवाद पर यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ ही महीनों में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ ने पिछले साल 20 सितंबर को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। यह विवाद करीब 120 साल पुराना है। कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) के 2007 में दिए गए आदेश को कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सीडब्ल्यूडीटी ने 2007 में इस विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला दिया था। उसने तमिलनाडु में 192 टीएमसी (1000 मिलियन क्यूबिक) फीट पानी को कर्नाटक द्वारा मेटटूर बांध में छोड़ने के आदेश दिए थे, जबकि कर्नाटक को 270, केरल को 30 और केरल को सात टीएमसी फीट जल आवंटित किया था। सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार को आने वाले फैसले को लेकर बेंगलुरु में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है।
पत्रकार वार्ता में बेंगलुरु पुलिस आयुक्त टी सुनील कुमार ने बताया कि 15,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाएगा। इसके अलावा कर्नाटक स्टेट रिजर्व पुलिस और अन्य बलों को भी तैनात किया जाएगा। आयुक्त ने कहा, “संवेदनशील इलाकों पर विशेष नजर रखी जाएगी, जहां इसे लेकर पहले दंगे हो चुके हैं।” कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस समय आया है जब दो महीने बाद कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होंगे। अब वहां के राजनीतिक दल भी इस फैसले को अपने पक्ष में भुनाने में जुट गए हैं। आसन्‍न चुनाव को देखते हुए हर पार्टी के लिए इस मुद्दे पर मतदाताओं को अपने पक्ष में करना जरूरी है। आपको बता दूं कि दक्षिण भारत में कावेरी नदी को वही सम्‍मान प्राप्‍त है जो भारत में गंगा को हासिल है। फिर कावेरी नदी को कर्नाटक के किसानों के लिए लाइफलाइन भी माना जाता है।
ऐसे में विधानसभा चुनाव से ठीक दो महीने पूर्व प्रदेश के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आने से चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों के लिए यह तड़के की तरह काम करेगा। कावेरी विवाद को लेकर यह जान लेना जरूरी है कि इससे पहले पंचाट ने तमिलनाडु को 192 टीएमसी फीट, कर्नाटक को 270 टीएमसी फीट पानी देने का फैसला सुनाया था। जिसका दोनों राज्‍यों ने विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट में अपील कर अपने-अपने पक्ष में दावे पेश किए । एक दशक बाद इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला शुक्रवार को सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में तमिलनाडु का कावेरी से हिस्‍सा घटाकर 192 टीएमसी फीट से 177.25 टीएमसी फीट कर दिया।
कर्नाटक का हिस्‍सा 270 टीएमसी फीट से बढ़ाकर 284.75 फीट कर दिया। यानि कर्नाटक को अब कावेरी से 14.75 टीएमसी फीट पानी अतिरिक्‍त मिलेगा। इसका सबसे ज्‍यादा लाभ वहां के किसानों को मिलेगा। अब यह जान लेना भी जरूरी है कि कर्नाटक के किसानों को कावेरी का पानी अधिक दिलाने के लिए सभी पार्टियों ने अपने-अपने स्‍तर पर जोर लगाया था। इसलिए राजनीतिक दल भी इसे अपने हित में भुनाना चाहेंगे। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। सीएम सिद्धारमैया की छवि बहुत अच्‍छी नहीं है। प्रदेश के किसानों में खराब मौसम, फसल की बर्बादी और रोजगार के अभाव, बैंक लोन से तंग आकर बड़े पैमाने पर आत्‍महत्‍याएं की हैं। हालांकि उन्‍होंने कावेरी मुद्दे पर सरकार में होते हुए भी एक सीमा से परे जाकर किसानों की आवाज बुलंद करने का काम किया। लेकिन किसानों को जरूरी राहत देने व युवाओं को रोजगार दिलाने में सफल नहीं रहे हैं। साथ ही पार्टी आंतरिक कलम से भी जूझती रही है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का ऐन मौके पर आया फैसला उनके लिए रामवाण साबित हो सकता है। और चाहेंगे कि पार्टी को इसका लाभ विधानसभा चुनाव मिले। भाजपा को इसका दोहरा लाभ मिलेगा। ऐसा इसलिए कि पार्टी पहले से ही प्रदेश में एंटी इनकम्‍बेंसी लहर का लाभ उठाना चाहती है।
कावेरी मुद्दे पर केवल प्रदेश इकाई ही नहीं बल्कि केन्‍द्र सरकार का रुख भी कर्नाटक के पक्ष में ही रहा। इस बात को लेकर केन्‍द्र पर सवाल भी उठते रहे पर पार्टी ने इसको दरकिनार करना बेहतर समझा। ऐसी स्थिति में भाजपा एंटी इनकम्‍बेंसी के साथ अब कावेरी पर भी लाभ उठाने का प्रयास करेगी। कर्नाटक को कावेरी का पानी ज्‍यादा दिलाने के मुद्दे पर जेडीएस के वरिष्‍ठ नेता व पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा पहले ही क्षेत्रीय मानसिकता का परिचय दे चुके हैं। उन्‍होंने सुप्रीम कोर्ट के पिछले रुख पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि तमिलनाडू के किसान एक साल में तीन फसल उगा रहे हैं। जबकि कर्नाटक के पास एक फसल के लिए भी पानी नहीं है। ऐसे मेंउन्‍हें पानी देना कैसे संभव है। इसके विरोध में तमिलनाडू के लोगों को एकजुट होना होगा। अब वो इसी का लाभ चुनाव में उठाने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही जीडीएस ने कर्नाटक में इसको लेकर अभियान भी चलाया था। जेडीएस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 को देखते हुए बसपा प्रमुख मायावती से हाथ मिला लिया है। उन्‍होंने बसपा के लिए 14 सीटें छोड़ने का फैसला लिया है। बीएसपी ने पहली बार 2004 में राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। 2004 के विधानसभा चुनावों में पार्टी 102 सीटों पर मैदान में थी और उसे 1.74 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे।
2009 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने अपने 9 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था और 1.22 प्रतिशत वोट प्राप्त किए थे। जेडीएस के पास राज्य में 15 प्रतिशत का वोट शेयर है। गठबंधन के जरिए उसकी कोशिश की वोट शेयर बढ़ाने की है। कर्नाटक विधानसभा में कुल 224 सीटें हैं। वर्तमान में कांग्रेस के पास 122, भाजपा के पास 40 और जनता दल सेक्‍यूलर के पास 40 सीटें हैं। 22 सीटें अन्‍य क्षेत्रीय दलों और निर्दलियों के पास है। सरकार बनाने के लिए 113 विधायकों का समर्थन जरूरी है। इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए हर पार्टी को जोड़ लगाना होगा। ऐसे में कोई भी पार्टी इस मुद्दे को छोड़ना पसंद नहीं करेगी। आपको बता दूं कि कावेरी विवाद 1892 व 1924 में मैसूर राज्य व मद्रास प्रेसिडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु) के बीच जल-बँटवारे को लेकर समझौते हुए थे। आजादी के बाद मैसूर का कर्नाटक में विलय हो गया। इसके बाद से कर्नाटक को लगने लगा कि मद्रास प्रेसिडेंसी पर अंग्रेजों का प्रभाव अधिक था, इसलिये समझौता मद्रास के पक्ष में किया गया है। उसके बाद से ही यह विवाद चला आ रहा है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच चल रहे कावेरी नदी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुना दिया।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अमिताव रॉय और ए.एम. खानविलकर की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि नदी पर कोई राज्य दावा नहीं कर सकता है। कोर्ट ने तमिलनाडु के हिस्से का पानी घटाकर 177.25 टीएमसी कर दिया है। इससे कर्नाटक को 14.75 टीएमसी पानी का फायदा मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि कावेरी के जल में कर्नाटक का हिस्सा इस तथ्य को देखकर बढ़ाया जा रहा है कि बीते दिनों में बेंगलुरु में पीने के पानी की मांग बढ़ी है। साथ ही इंडस्ट्रियल इलाकों में भी पानी की खपत में इजाफा देखा गया है। कर्नाटक, पानी की मात्रा बढ़ाए जाने से खुश है तो वहीं तमिलनाडु ने इसका वैकल्पिक रास्ता ढूंढने की बात कही है।
तमिलनाडु पक्ष के वकील एन कृष्णा ने कहा कि हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। लेकिन पानी की मात्रा राज्य के लिए पर्याप्त नहीं है। पानी की कमी को लेकर हमने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से भी मुलाकात की थी। उन्होंने बताया कि इस संदर्भ में दो योजनाओं पर चर्चा हई। सुप्रीम कोर्ट का फैसला कर्नाटक के पक्ष में आने पर राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने खुशी जताई है। फैसले से पहले कर्नाटक में सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी गई थी। कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू और मैसूर में करीब 10 हजार जवानों को तैनात किया गया था। तमिलनाडु में भी सुरक्षा की व्यवस्था बेहद कड़ी है। आपको बता दें कि कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल ने साल 2007 के फरवरी महीने में कावेरी ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी थी। कर्नाटक चाहता है कि तमिलनाडु के लिए नदी के जल का आवंटन कम किया जाए तो वहीं तमिलनाडु भी कर्नाटक के लिए ऐसा ही चाहता है।
साल 2007 में ट्रिब्यूनल के फैसले में तय हुआ था कि तमिलनाडु को 419 टीएमसी पानी, तमिलनाडु को 270 टीएमसी, केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी पानी दिया जाए। सभी राज्यों का कहना था कि उन्हें उनकी जरूरत के अनुसार कम पानी मिलता है। अंतिम सुनवाई में कर्नाटक ने कहा था कि 1894 और 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी के साथ जल समझौता किया गया था। 1956 में बने नए राज्य की स्थापना के बाद इस करार के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
कर्नाटक के मुताबिक तमिलनाडु को सिर्फ 132 फीट टीएमसी पानी आवंटित किया जाना चाहिए। कर्नाटक की इस दलील पर तमिलनाडु को एतराज है और दोनों राज्यों के बीच ठनी हुई थी। तमिलनाडु का कहना है कि हमें हर बार पानी के दावे के लिए कोर्ट से गुहार लगानी पड़ी है। उनका कहना है कि कर्नाटक को 55 टीएमसी फीट पानी आवंटित किया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि कर्नाटक को अब 284.75 टीएमसी फीट पानी मिलेगा। केरल को 30 टीएमसी फीट और पुड्डूचेरी को 7 टीएमसी फीट पानी मिलता रहेगा। उसमें कोई बदलाव नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के कावेरी बेसिन में जमीन के नीचे मौजूद 20 टीएमसी फीट पानी में से 10 टीएमसी फीट पानी इस्तेमाल करने की भी इजाजात दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा बेंगलुरु में ग्राउंड वॉटर के लिए 10 टीएमसी फीट और शहर के लोगों के पीने के लिए 4.75 टीएमसी फीट पानी की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि पीने के पानी को सबसे ऊंचे लेवल पर रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसका यह फैसला 15 साल के लिए लागू रहेगा। कावेरी नदी कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में बहती है। समुद्र में मिलने से पहले ये पांडिचेरी के कराइकल से भी गुजरती है। 800 किलोमीटर लंबी कावेरी नदी पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी पर्वत से निकलती है। यह इलाका कर्नाटक के कुर्ग क्षेत्र में आता है।
कावेरी नदी में चारों राज्यों की नदी-तालाबों से भी पानी डाला जाता है। जानकारों के मुताबिक, इसका 740 टीएमसी फीट पानी इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होता है। कर्नाटक 462 टीएमसी फीट पानी डालता है। उसमें से उसे 270 टीएमसी फीट पानी इस्तेमाल करने की इजाजत थी। तमिलनाडु 227 टीएमसी फीट पानी डालता है। उसे 419 टीएमसी फीट इस्तेमाल करने की इजाजत थी। केरल 51 टीएमसी फीट पानी डालता है। उसे 30 टीएमसी फीट पानी मिलता था। 14 टीएमसी फीट पानी पर्यावरण के लिए छोड़ना पड़ाता है। इसके मुताबिक, कर्नाटक नदी में सबसे ज्यादा पानी डालकर भी उससे कम पानी पा रहा था। ट्रिब्यूनल के फैसले के मुताबिक, उसे अपना 192 टीएमसी फीट पानी तमिलनाडु को देना था। इसका वह विरोध करता था। मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर राज के बीच यह विवाद 19th सेंचुरी में शुरू हुआ था। उस वक्त अंग्रेजों की सरकार थी।
1924 में इन दोनों के बीच एक समझौता हुआ, लेकिन बाद में इस विवाद में केरल और पांडिचेरी भी शामिल हो गए। 1976 में चारों राज्यों के बीच समझौता हुआ। लेकिन इसका पालन नहीं किया गया। यह विवाद मुख्य रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच था। दोनों राज्य एक दूसरे को कम पानी देना चाहते थे। कर्नाटक कहता है कि वह नदी के बहाव के रास्ते में पहले पड़ता है, इसलिए पानी पर पहला हक उसका है। उसका यह भी कहना था कि अंग्रेजों के दौर में हुए समझौते में उसे उसके ही पानी का सही हिस्सा नहीं मिला। कर्नाटक ने कहा कि 1894 और 1924 में उस वक्त की मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर रियासत के बीच जल समझौता किया गया था। 1956 में नए राज्य कर्नाटक और तमिलनाडु बने। ऐसे में वह समझौता नए राज्यों के बीच लागू नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु का कहना था कि अंग्रेजों के दौर में हुए समझौते का पालन करना चाहिए। उसे पहले जितना पानी मिलते रहना चाहिए। उसे कावेरी के पानी की ज्यादा जरूरत है।
साथ ही सरकार खेती के लिए किसानों को जरूरत का पानी मुहैया कराने के लिए कमिटेड है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखते हुए बेंगलुरु में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, शहर में पुलिस के 15000 जवान तैनात किए गए हैं। इनके अलावा कर्नाटक स्टेट रिजर्व पुलिस और दूसरी फोर्सेस को भी लगाया गया है। उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में पहले दंगे हो चुके हैं वहां खास एहतियात बरती जा रही है। कर्नाटक का दावा है कि कृष्णा सागर डैम में सिर्फ शहर की जरूरत भर का पानी ही बचा है। “एआईएडीएमके सरकार वो सब अधिकार खो चुकी है, जिन्हें कलईनार (एम करुणानिधि) ने तमिलनाडु के लिए हासिल किया था। तमिलनाडु के साथ धोखा हुआ है। मैं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से गुजारिश करता हूं कि वे किसान संगठनों के साथ एक सर्वदलीय बैठक बुलाएं।” कमल हासन, एक्टर और पॉलिटीशियन “मैंने अभी सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला नहीं पढ़ा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नदी के पानी पर किसी भी राज्य का मालिकाना हक नहीं है, सुप्रीम कोर्ट की ये बात थोड़ी राहत देती है।” “हम इस फैसले के लिए कई सालों से लड़ रहे थे। अब कामयाबी मिली है।”