May 28, 2024

सियासी सुर्खियों में रहे इस मामले को लेकर जिले के राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि सत्ता के दम पर जिला देहात भाजपा अध्यक्ष ने मुकदमा दर्ज कराने वाले मजदूरों पर दबाव बनाकर अपने पक्ष में बयान देने के लिये मजबूर कर दिया,इसके चलते पुलिस भी इस मुकदमें की जांच करने के बजाय एफआर लगाने की तैयारी में जुट गई है।
बीकानेर। अनाज मण्डी में मेहनतकश और गरीब पल्लेदारों के बैंक खाते खोलकर, उनमें रातोंरात करोड़ों रुपए जमा करवाने के बहुचर्चित मामले देहात भाजपा जिलाध्यक्ष सहीराम दूसाद और उसके लड़के के खिलाफ सदर थाने में दर्ज मामले में पुलिस ने एफआर लगाने की तैयारी कर ली है।
थाना प्रभारी के अनुसार मामला दर्ज कराने वाले मजदूरों ने स्टॉम्प पर लिखकर दे दिया है कि वह इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं चाहते इसलिये पुलिस ने जांच कार्यवाही बंद कर दी है। जानकारी में रहे कि पिछले साल अनाज मंडी के गरीब पल्लेदारों के बैंक खाते खोलकर, उनमें रातोंरात करोड़ों रुपए जमा करवा दिए गए। इतना ही नहीं, खातों में जिस तरह राशि जमा कराई गई, उसी तरह निकाल भी ली गई। आधार कार्ड का दुरुपयोग कर फर्जी बैंक खाते खुलवाने के आरोप देहात भाजपा जिलाध्यक्ष सहीराम दुसाद और उनके लड़के पर लगाये गये। मामला उजागर होने के बाद सदर थाना पुलिस ने पीडि़त पल्लेदारों के परिवाद पर सहीराम दुसाद और उसके लड़के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। करीब पखवाड़े भर तक सुर्खियों में रहे इस पॉलिटिक्ल केस के मामले में सत्तारूढ दल के देहात जिलाध्यक्ष नामजद होने के कारण पुलिस की फूंक फूंक कर कदम रखने को मजबूर हो गई थी। इस बीच नोखा और लूणकरणसर के कई दंबग जाट नेताओं ने इस मामले में आरोपी सहीराम दुसाद को बचाने के लिये अपनी समूची ताकत झोंक दी और उन पल्लेदारों पर बयानों से मुकरने तथा किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं करने के लिये दबाव में ले लिया।
इनके खातों में जमा हुई राशि
जिन पल्लेदार ओमप्रकाश, नरसीराम, सहीराम, हड़मानाराम, रूपाराम, भंवर लाल पुत्र सेवा राम, नंदराम, भंवरलाल पुत्र ऊदाराम, आसुराम, भंवरलाल पुत्र लेखराम, गुलाबराम, फेफाराम, जगदीश के बैंक खातों में करोड़ों रुपए का लेन-देन हुआ है। असल में ये पल्लेदार मनरेगा में भी मजदूरी करते हैं। उन्होंने जब मजदूरी का पैसा पंचायत समिति के अधिकारियों से मांगा तो अधिकारियों ने उनके केनरा बैंक के खातों में पैसा डालने की बात कही। पल्लेदारों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्हें बताया गया कि उनकी मनरेगा मजदूरी की रकम उनके बैंक खातों में जमा करा दी गई है। लेकिन हकीकत तो यह है कि मजदूरों ने खाता खुलवाना तो दूर, कभी बैंक की शक्ल तक नहीं देखी।