April 20, 2024

(जी.एन.एस) – डॉ. वेदप्रताप वैदिक . विदेश नीति के मामले में हम कैसे गच्चा खा रहे हैं, यह मालदीव के बाद अब रोहिंग्या-संकट सिद्ध कर रहा है। म्यांमार (बर्मा) के पूर्वी प्रांत राखीन में लगभग दस लाख रोहिंग्या मुसलमान बरसों से रह रहे हैं। वे बांग्लादेशी हैं। अगस्त में कुछ रोहिंग्या आतंकवादियों ने बर्मी फौज और पुलिस पर हमला बोल दिया। कई लोग हताहत हुए। बर्मी फौज और जनता ने रोहिंग्या मुसलमानों के साथ बदला लिया। इतना क्रूर व्यवहार किया कि लगभग साढ़े छह लाख रोहिंग्या ने भागकर बांग्लादेश में शरण ले ली। जिन दिनों ये शरणार्थी भाग रहे थे, संयोगवश हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बर्मा पहुंचे हुए थे। वहां पहुंचकर उन्होंने क्या किया ? उन्होंने रोहिंग्या लोगों के प्रति सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं कहा बल्कि उल्टे बर्मा में ‘आतंकियों की हिंसा’ पर चिंता व्यक्त की। बर्मा की एकता और अखंडता के बारे में वे चिंतित दिखे। आप जिस देश के मेहमान हैं, उसमें जाकर उसके विरुद्ध बोलें, यह उचित नहीं है लेकिन मोदी यह कैसे भूल गए कि वे उस भारत के प्रधानमंत्री हैं, जिसने बांग्लादेश बनाया है और यह वह भारत है, जिसके बर्मा और बांग्लादेश, दोनों ही अभिन्न अंग थे। वह यह भी भूल गए (या उन्हें पता ही नहीं) कि इसी बर्मा ने 1964 में लगभग एक लाख भारतीयों को खदेड़कर भारत आने को मजबूर कर दिया था। यदि वे रोहिंग्या-संकट में किसी का भी पक्ष नहीं लेते और बर्मा व बांग्लादेश के बीच मध्यस्थता करते तो उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि कितनी चमकती। दुनिया में भारत की छवि सिर्फ लच्छेदार भाषणों से नहीं बनेगी बल्कि विदेश नीति की पेचीदगियों को समझकर उचित पहल करने पर बनेगी। जो काम मोदी को करना था, वह चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने बर्मा और बांग्लादेश जाकर कर दिया। वांग की पहल पर दोनों देशों ने तीन-सूत्री समझौता कर लिया। यदि यही काम विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को सौंपा जाता तो वह इसे मोदी और वांग से भी अच्छे तरीके से कर सकती थी। चीन ने काफी दूर का पास फेंका है। अब उसे बांग्लादेश और बर्मा में अपना आर्थिक बरामदा बनाने में काफी आसानी होगी। बर्मा की फौजी सरकार से चीन के संबंध पहले ही घनिष्ट थे। अब वे और घनिष्ट होंगे। बर्मी नेता सू ची ने पेइचिंग जाकर उन पर मोहर लगा दी है। कितनी विडंबना है कि ये दोनों देश पड़ौसी तो भारत के हैं लेकिन चीन भारत के पिछवाड़े में अपनी चौपड़ जमा रहा है।