February 22, 2024

बजट सत्र में जवाबदेही कानून लाएगी सरकार : लोगों का काम न करने पर अफसरों को खोनी पड़ेगी नौकरी, सुझाव मांगे

जयपुर। आप कल्पना कीजिए कि यदि किसी पुलिस वाले ने आपकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की तो उसकी नौकरी जा सकती है।….लाइसेंस नहीं बना तो आरटीओ के कर्मचारी की नौकरी जा सकती है। ऐसी एक या दो नहीं, राजस्थान में लोगों से जुड़ी सैकड़ों सर्विसेज हैं, जो जल्द ही एक ऐसे कानून के दायरे में आ जाएंगी, जिसके तहत तय समय में काम नहीं करने पर अफसरों और कर्मचारियों को सजा मिलेगी।
राज्य सरकार इसके लिए राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी और जवाबदेही विधेयक-2022 नाम से एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला कानून लाने वाली है। इस कानून को बनाने के लिए प्रशासनिक सुधार विभाग ने आम लोगों से अपनी वेबसाइट पर सुझाव मांग रखे हैं। इन सुझावों को देने की अंतिम तारीख 9 नवंबर थी, जिसे अब बढ़ाकर 30 नवंबर कर दिया गया है।
रविवार को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जोधपुर में एक कार्यक्रम के तहत इसका जिक्र भी किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक संगठनों ने कई बार इस कानून की मांग की है, अब जल्द ही इसे लाया जा रहा है।
इधर सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस कानून को विधानसभा के अगले सत्र में पेश किया जाएगा। संभवत: अगला सत्र बजट सत्र होगा जिसमें यह कानून पेश होगा।

क्यों बढ़ाई गई तारीख
सरकारी विभागों में कार्यरत अफसरों-कर्मचारियों को जनता के काम समय पर करने के लिए जवाबदेह बनाने के लिए राज्य सरकार जो कानून लाना चाहती है, उस में जनता ने ही कोई खास रुचि नहीं दिखाई है। सचिवालय स्थित प्रशासनिक सुधार विभाग ने अपनी वेबसाइट पर महीने भर पहले इस कानून को बनाने के लिए आम लोगों से सुझाव मांगे थे। लेकिन कोई खास सुझाव मिले ही नहीं।

गहलोत ने बनाई थी हाल ही पुलिस जवाबदेही कमेटी
राजस्थान में हाल ही सीएम अशोक गहलोत ने पुलिस जवाबदेही कमेटी बनाई है। इस कमेटी के गठित होने के बाद से ही प्रदेश में जवाबदेही कानून लागू करने की चर्चाएं तेज हो गई थीं। सीएम गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल में सेवाओं के प्रदान की गारंटी कानून भी 2011 में बनाया था।लेकिन उस कानून में जनता का काम नहीं करने वाले अफसरों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई करने का प्रावधान नहीं था। अब जो नया कानून बन रहा है, उसमें यह प्रावधान होगा। अगर कोई सरकारी अफसर या कर्मचारी जनता का काम नहीं करने का जवाबदेह पाया गया तो उसकी नौकरी तक छीन लेने की कार्रवाई होगी।

कौन आंदोलनरत हैं जवाबदेही कानून के लिए
इस कानून के लिए पिछले दो वर्षों से प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय और उनके सहयोगी कार्यकर्ता निखिल डे आंदोलनरत हैं। अरुणा के प्रयासों और प्रारूप पर ही वर्ष 2005 में राजस्थान में ही देश में सबसे पहले सूचना का अधिकार (आरटीआई) बना था, जो बाद में देश भर में लागू हुआ।
केन्द्र की यूपीए सरकार (2004-2014) के दौरान अरुणा यूपीए चैयरपर्सन सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की प्रमुख थीं। अरुणा ने तब आरटीआई कानून और महानरेगा कानून बनवाने की पहल की थी, जिसे यूपीए सरकार ने देश भर में लागू किया था।
इस कानून के गठन के लिए प्रयासरत सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने भास्कर को बताया कि अच्छी बात यह है कि मुख्यमंत्री गहलोत ने रविवार को जोधपुर में हमारे प्रयासों का उल्लेख भी किया और जल्द ही जवाबदेही कानून को लागू करने की बात भी कही।
हमें उम्मीद है कि सरकार जल्द ही विधानसभा में इस कानून को पेश करेगी। अगर यह कानून बना तो यह आम लोगों को उसी तरह से सशक्त करेगा जैसा कभी सूचना के अधिकार कानून ने किया था।

क्या होगा जवाबदेही कानून में
इस कानून को सूचना के अधिकार कानून का अगला महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है। इस कानून के तहत 5 मुख्य प्रावधान होंगे।
1. सरकारी विभागों में प्रत्येक काम को अधिकतम 30 दिनों में करना ही होगा
2. सरकारी विभागों को हर काम के लिए किसी भी व्यक्ति द्वारा पूछने पर यह बताना होगा उसका काम कौन सा अधिकारी-कर्मचारी करेगा
3. संबंधित काम को करने या ना करने के लिए एक सरकारी कार्मिक की जिम्मेदारी-जवाबदेही तय रहेगी
4. वाजिब व नियमानुसार हो सकने वाले काम को तय समय सीमा में ना करने पर संबंधित जवाबदेह कार्मिक पर आर्थिक, प्रशासनिक और वैधानिक कार्रवाई होगी
5. लगातार तीन बार जवाबदेही का उल्लंघन करने वाले कार्मिक की सरकारी नौकरी पूर्णत: खत्म करने की कार्रवाई होगी

नौकरशाही में हो रहा विरोध
यह कानून बनाने के लिए अरुणा राय और उनकी टीम जयपुर सहित प्रदेश के कई जिलों में रैली-धरना, प्रदर्शन आदि कर चुके हैं। एक यात्रा भी वे लगातार चला रहे हैं। जयपुर स्थित शहीद स्मारक पर कई बार धरने दिए जा चुके हैं। करीब तीन महीने पहले इस आंदोलन से संबंधित बिड़ला सभागार में हुए एक कार्यक्रम में गहलोत और अरुणा दोनों ने मंच भी साझा किया था।
सरकारी अधिकारी- कर्मचारियों का मानना है कि यह कानून उनके लिए बेहद सख्त होगा और सरकारी नौकरी करना बहुत कठिन हो जाएगा। ऐसा विरोध कभी सूचना के अधिकार कानून का भी हुआ था, लेकिन अंतत: वो कानून जनता के अधिकारों को सशक्त करने में बहुत कारगर साधन बना।
सूत्रों का कहना था कि जैसे कभी सूचना के अधिकार कानून को बनाने और लागू करने से पहले नौकरशाहों ने उसका खासा विरोध किया था। वैसे ही अभी अंदरखाने नौकरशाही द्वारा इस कानून का भी विरोध किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री गहलोत के अतिरिक्त इसका मसौदा अखिल अरोरा, कुलदीप रांका, आलोक गुप्ता जैसे वरिष्ठ आईएएस अफसरों को भी सौंपा गया है।

वाजिब कार्यों के लिए भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर, इसलिए है कानून की जरूरत
सरकारी कार्मिकों में काम करने या ना करने के प्रति कोई लगाव या भय जैसी कोई भावना नहीं होती। सूचना के अधिकार कानून के तहत भी सरकारी विभाग आम तौर पर सूचना मांगने वाले को यह बता कर निजात पा लेते हैं कि सूचना 30 दिनों के भीतर देनी है। इसके बाद काम ना होने या ना करने के विषय में किसी अभी तक राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में अगर किसी आम आदमी का कोई काम नहीं होता है या उसे चक्कर कटवाए जाते हैं, तो किसी सरकारी कार्मिक के खिलाफ सामान्यत: कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती है। ऐसे में यह जरूरत लंबे अर्से से महसूस की जा रही है कि जवाबदेही कानून बनाया जाए ताकि सरकारी कार्मिकों की जवाबदेही तय हो और जानबूझकर काम न करने पर संबंधित कार्मिक के खिलाफ नौकरी छीन लेने जैसी कड़ी कार्रवाई भी की जा सके।