April 20, 2024

सत्ता में आने के बाद जैसे नजरियाॅ ही बदल जाता है। कश्मीर में धारा 370 को खत्म करने के लिए कुलाचे मारे वाली वर्तमान सरकार भी कश्मीर मामले में अब समझौते पर उतर आई है। यही कारण है कि केसरी क्यारी के रूप में विख्यात कश्मीर में आतंकवादियों के जानजे इस तरह से निकाले जा रहे है मानों किसी योद्धा का जनाजा निकाला जा रहा है। इन आतंकियों को ‘‘हीरो’’ के रूप में महिमामण्डन कर कश्मीरी युवाओं को बरगलाने का खेल अब भी जारी है। आतंकी जानजे के ये चंद उदाहरण है जिन्हें पढ़कर आप समझ जाएगें कि ये जनाजे के बहाने आतंक को बढ़ावा देने सिलसिला घाटी में अब भी जारी है। जून 17 में लश्कर कंमाडर जूनेद मट्टू की बाॅत करे या फिर जुलाई 17 में लश्कर-ए-तैयबा कमांडर बशीर लश्करी के जनाजे की भीड़ और उत्तेजित नारे बाजी ने घार्टी को भड़काने में कोई कसर नही छोडी। नवम्बर 17 में आतंकी मुगीज अहमद मीर के जनाजे में भारी भीड़ की मौजूदगी में आतंकी समर्थकों ने आईएएस आईएसआई के नारे बाजी कर महौल बिगड़ने मे कोई कसर नही छोड़ी थी। इाल में मई 18 में हिजबुल आतंकी समीर टाईगर केे जनाजे में भारी भीड़ के बीच हाथियार लहरते दिखे यह विडियों खूब वायरल हुआ यही नही मई 18 में आतंकी फयाज के जनाजे में तो बैखौफ आतंकी समर्थक एके 47 से फायरिंग तक करते नजर आए। आतंकियों के जनाजे का ये सबसे रोमांचकारी नजारा होता है। भावुक और दिल दहला देने वाला। कश्मीरी आतंकी के जनाजे का जुलूस। एनकाउंटर में मारे गए आतंकी की लाश पोस्टमार्टम के बाद उसके परिजनों को सौंप दी जाती है। थोड़ी ही देर में स्ट्रेचर पर रखी लाश को भीड़ अपने कब्जे में ले लेती है और फिर शुरू होता है आजादी के नारों और दर्दनाक मातम का शोर। देखते ही देखते पूरा इलाका जनसैलाब में तब्दील हो जाता है। हजारों हजार लड़के, औरतें, मर्द, बुजुर्ग जनाजे को घेरे खड़े रहते हैं। दूर-दूर तक न पुलिस, न आर्मी, न सीआरपीएफ और न कोई कश्मीरी नेता। बस कंधे पर एके-47 टांगे लंबे बालों वाले आतंकी दिखते हैं। क्यूबा के क्रांतिकारी चे-गेवारा जैसी कैप पहने अपने साथी को गन सैल्यूट के साथ अंतिम विदाई देने के लिए। इस आखिरी सलाम की गोलियों की आवाज दूर सीआरपीएफ और राजपूताना राइफल्स के फौजी कैंपों तक सुनाई देता है। सेना समझ जाती है कि दूर कहीं आतंकियों की नई फसल तैयार हो रही है।
घाटी में खासी, छोडा, उधमपुर, रागी, मुई शोपियां, पुलवामा से लेकर श्रीनगर तक की भीड़ इन आतंकियों के जनाजों में शामिल होती है। इसमें बाहरी मीडिया को प्रतिबंधित रखा जाता है। हर जनाजे के बाद लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन नए आतंकी बने लड़कों की तस्वीर जारी करता है। इसी वर्ष की 7 मई को शोपियां की जामिया मस्जिद में सद्दाम पाडर के जनाजे में हजारों हजार युवाओं का मजमा जुटा था। इस दौरान जो नारे बाजी और जिस तरह से मृतक आतंकी का बखान हुआ उसके परिणारूप अगले एक हफ्ते में पांच नए आतंकी बने, जिसमें आवंतीपुरा का तौसीफ ठोकर भी शामिल था। बाद में उसकी भी तस्वीर वायरल की गई थी। ऐसे में जनाजे के बहाने आतंक को बढ़ावा देने की वारदाते कश्मीरी युवा को भटका रही है। सेना में कर्नल स्तर के एक अधिकारी मुताबिक दिल्ली से श्रीनगर तक की उच्चस्तरीय बैठकों में हम, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस भी इन जनाजों के जुलूस बंद कराने के लिए लिख कर दे चुके हैं। ये केवल कश्मीर का माहौल खराब कर रहे हैं। पहले पाकिस्तानी आतंकी के मरने पर भी जनाजा निकलता था। लोगों को याद होगा कि ढाई साल पहले लश्कर के कश्मीर कमांडर अबू कासिम के जनाजे में एक लाख लोग जुटे थे। तब से विदेशी आतंकी के जनाजों पर रोक लग गई। अब पुलिस उनकी लाश कश्मीर के किसी इलाके में चुपचाप दफना देती है, लेकिन कश्मीरी आतंकियों के जनाजे पर कोई रोक नहीं। सेना के आला अफसर नाम न छापने की शर्त पर कहते है कि पुलिस, सेना कस्टडी में आतंकी के शव को चार-पांच परिजनों की मौजूदगी में किसी अज्ञात जगह दफना देना चाहिए, लेकिन सूबे की वोट की राजनीति इसके लिए तैयार नहीं है। महबूबा सरकार ऐसे जनाजों को रोक कर जनता की और नाराजगी मोल नहीं ले सकती। फिर हुर्रियत और अलगाववादी ऐसा होने नहीं देंगे क्योंकि वह कभी नहीं चाहते कि कश्मीर में हालात सुधरे।आतंकियों के जनाजे पर रोक लगाना कठिन राजनीतिक निर्णय है। ये निर्णय हम अकेले नहीं कर सकते। हमने इतना जरूर किया है कि ऐसे जनाजों में भड़काऊ भाषण देने पर एफआईआर दर्ज करनी शुरू कर दी है। आतंकियों को गन सैल्यूट देने की जानकारी है लेकिन वहां इतनी भीड़ होती है कि हम कार्रवाई करें तो बड़ा नुकसान हो सकता है।यही नही कश्मीरी युवाओं को धर्म के नाम पर भड़काने ज्यादातर पाकिस्तानी चैनलों पर कश्मीर में हिंसा करने वालों को नायकों की तरह पेश किया जाता है और मुठभेड़ में मारे जाने वाले आतंकियों को शहीद का दर्जा दिया जाता है। इतना ही नहीं सऊदी चैनलों पर कट्टरपंथी मौलानाओं के प्रवचनों में उन्हें दकियानूसी बातें कहते हुए सुना जा सकता है। मसलन, मुस्लिम महिलाओं को पतियों के सामने हर तरह से आत्म समर्पित रहना चाहिए। यहां तक कि घर से निकलने के लिए भी उन्हें पतियों की इजाजत लेनी चाहिए। पुलिस अधिकारी तो यहां तक कहते हैं कि सऊदी और पाकिस्तानी चैनलों के अलावा कुछ भारतीय चैलन भी खबरों को तोड़मरोड़ कर और अलगाववादियों के पक्ष पेश करने से बाज नहीं आ रहे हैं। चैनल इस तरह की खघ्बरें दिखा रहे हैं, जिनसे सुरक्षा बलों की छवि खराब हो। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसी छूट कब तक जारी रहेगी। भारत के सुरक्षा बल जवाबी कार्रवाई में सक्षम हैं, लेकिन अगर समय-समय पर बरती जाने वाली ढिलाई बंद कर दी जाए। सैनिकों को जरूरत का हर सामान मुहैया करा दिया जाए, तो हमारे वीर सपूतों को इतनी कुर्बानियां नहीं देनी पड़ेंगी। इसके अलावा असल जरूरत सभी विभागों, केंद्र और संबंधित सभी सरकारों के बीच श्रेष्ठ तालमेल की भी है। जब कश्मीर जैसे संवेदनशील और देश की प्रतिष्ठा और गौरव से जुड़े सबसे बड़े मसले की बात हो और प्रतिबंध के बावजूद इंटरनेट सेवाएं जारी रहने या फिर उकसाऊ-भड़काऊ विदेशी चैनलों के कश्मीर के घर-घर में चलने की खबरें आती हैं, तब भरोसा कहीं डगमगाने लगता है। आजादी के 70 साल बाद कम से कम अब तो ऐसा नहीं लगना चाहिए कि हम इतने बड़े सवालों से जूझते हुए ऐसे लगें कि जैसे गुड्डे-गुड़िया के ब्याह का खेल खेल रहे हैं। आतंकी का कोई मजहब ईमान है ही नही। इस बाॅत को मुस्लिम समाज ईमान, मौलना, मौलवी सभी स्वीकार कर चुके है, तो ऐसे में सेना की मंशा के मुताबिक आतंकी मौत के बाद उसका अंतिम क्रिया उनके परिजनों के अलावा और किसी को जाने की अनुमति न दी जाए।